राजमार्ग मा चल रहें , बड़े बेढंगे यान।
चालक काही है नहीं, अपर डिपर का ज्ञान।।
हेमराज हंस
राजमार्ग मा चल रहें , बड़े बेढंगे यान।
चालक काही है नहीं, अपर डिपर का ज्ञान।।
हेमराज हंस
खाता बचा है करंसी चली गै।
मछरी के लोभ मा बंसी चली गै।।
जब से मरे हें जेपी औ लोहिया देस मा
तब से बिपक्ष कै बड़मंसी चली गै।।
दार महँगी है खा ल्या सजन सुसका। दार महँगी ।
भाव सुनत मा लागय गरे ठुसका।। दार महँगी ।।
किधनव बनाउब पानी पातर।
एक दुइ दिन का दइ के आंतर।।
लड़िकन के मुंह दइ के मुसका। दार महँगी ।
दार महँगी है खा ल्या बलम सुसका। दार महँगी ।।
गुजर करब खा लपटा मीजा।
दार बनी जब अइहैं जीजा।।
करंय का मजूरी कहूं खसका। । दार महँगी।
दार महँगी है खा ल्या बलम सुसका। दार महँगी ।।
कइसा चलय अटाला घर का।
अइसा पाली पोसी लरिका ।।
जइसा सीता मइया लउकुस का। दार महँगी।
दार महँगी है खा ल्या बलम सुसका। दार महँगी ।।
✍️हेमराज हंस भेड़ा मैहर
चाहे कोऊ कवि लिखय, चह शायर श्रीमान।
सब्द सक्ति जब तक नहीं, तब तक नही प्रमान।।
हमरेन पुरखन का गरिआई, अउर भरी हमिन हूंकी।
हम नहि येतू प्रगतिशील , कि बाप के फोटो मा थूँकी।।
नित परभाती औ सँझबाती, करत देस का पूजीथे
द्रश्टिदोख मा उदवबत्ती अपना का लागय लूकी।।
हम गंगा कबेरी के पुजइया, रोज नहात मा सुमिरी थे
हमीं बिदेसी कहिके अपना, नाहक मा जबान चूकी ।।
जे हमरे इष्ट तिथ तेउहारन मा घिनहे राखय भाव सदा
हम ओहू का आदर देई थे, की चली अपना शंख फूंकी।।
जेखर उजरइती एकअंगी, कल्थी कल्थी लागथी हंस
उइ भंडारा का जानैं जे पाइन बिचार कउरी टूकी।।
हेमराज हंस
जेखे मूड़े मा रहय, अपना का आशीष ।
वा बन जाय कनेर से , गमकत सुमन शिरीष। ।
