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रविवार, 2 नवंबर 2025
तुलसी गाथा
मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025
मिश्र बंधु के तुलसीदास
गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी का नर काव्य
शनिवार, 25 अक्टूबर 2025
डॉ० भगीरथ मिश्र, एम० ए०, पी-एच० डी० अध्यक्ष, हिन्दी विभाग सागर विश्वविद्यालय
प्रसिद्ध इतिहासकार विसेंट ए० स्मिथ (Vincent A. Smith) ने अपने सुविख्यात ग्रंथ अकबर महान् (Akbar, The Great Moghul) नामक ग्रंथ में लिखा है' कि तुलसीदास अपने युग में भारतवर्ष के सबसे महान् व्यक्ति थे; अकबर से भी बढ़कर, इस बात में कि करोड़ों नर-नारियों के हृदय मौर मन पर प्राप्त की हुई कवि की विजय, सम्राट की एक या समस्त विजयों की अपेक्षा असंख्यगुनी अधिक चिरस्थायी और महत्त्वपूर्ण थी ।
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१. (अ) आनन्दकानने कश्चित् तुलसी जंगमस्तरः ।
कविता मंजरी यस्य रामभ्रमरभूषिता ॥ -मधुसूदन सरस्वती
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१. डॉ० जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा है कि आधुनिक काल में तुलसीदास के समान दूसरा ग्रन्थकार नहीं हुआ है।
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तुलसीदास जी पर लिखे गये हिन्दी ग्रन्थों की भी एक लम्बी सूची है जिनमें से प्रमुख १. रामचन्द्र शुक्ल कृत, तुलसीदास, २. श्यामसुन्दर दास और पीता- म्बर दत्त बड़थ्वाल कृत, गोस्वामी तुलसीदास, ३. बलदेव प्रसाद मिश्र कृत, तुलसी दर्शन, ४. रामनरेश त्रिपाठी कृत, तुलसीदास और उनकी कविता, ५. माताप्रसाद गुप्त कृत, तुलसीदास, ६. चन्द्रबली पांडेय कृत, तुलसीदास, ७. व्यौहार राजेन्द्रसिंह कृत, गोस्वामी तुलसीदास की समन्वय-साधना,
८.रामबहोरी शुक्ल कृत, तुलसीदास १. कामिल बुल्के कृत, रामकथा: उद्भव और विकास, १०. परशुराम चतुर्वेदी कृत मानस की रामकथा तथा ११. राजपति दीक्षित कृत, तुलसीदास और उनका युग हैं। इन समस्त ग्रन्थों की अपनी- अपनी विशेषताएँ हैं। जीवन वृत्त के सम्बन्ध में विशेष सामग्री देने वाली कृति माताप्रसाद गुप्त कृत, तुलसीनास है और इस सम्बन्ध में विशेष दृष्टिकोण प्रदान करने वाले ग्रन्थ रामनरेश त्रिपाठी कृत, तुलसीदास और उनकी कविता तथा चन्द्रबली पांडेय और रामबहोरी शुक्ल के ग्रन्थ हैं। माताप्रसाद गुप्त ने समस्त सामग्री को सामने रख कर कोई निर्णय नहीं दिया, त्रिपाठीजी का आग्रह सोरों में तुलसी की जन्मभूमि के प्रति तथा रामबहोरीजी का राजापुर और चन्द्रबलीजी का अयोध्या के लिए है। बलदेवप्रसाद मिश्र का तुलसीदर्शनगोस्वामीजी के दार्शनिक मत का स्पष्टीकरण करने वाला ग्रन्थ है और समन्वयसाधना में तुलसीदास के समन्वयात्मक दृष्टिकोण को प्रकट किया गया है । कामिल बुल्के के ग्रन्थ में रामकथा के स्वरूप और विस्तार का अध्ययन हुआ है और इस प्रसंग में बलदेवप्रसाद मिश्र की 'मानस में रामकथा' और परशुराम चतुर्वेदी की 'मानस की रामकथा' पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। काव्य की दृष्टि से रामचन्द्र शुक्ल की कृति, रामनरेश त्रिपाठी और चन्द्रबली पांडेय के ग्रन्थ अपनी-अपनी विशेषताओं से युक्त हैं, पर शुक्लजी के ग्रन्थ के समान मार्मिकविश्लेषण अभी और अधिक होने की आवश्यकता है। राजपति दीक्षित ने समकालीन परिस्थितियों और धार्मिक भावना का विशेष रूप से अध्ययन किया है। अतः इन ग्रन्थों में अपने-अपने दृष्टिकोण से एक या अनेक पक्षों का उद्घाटन हुआ है ।
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१. सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय । गोद लिये हुलसी फिरैं, तुलसी सो सुत होय
भक्तमाल इनमें नाभादास का भक्तमाल सबसे अधिक प्रामाणिक है। इसमें तुलसीदास जी को भक्तमाल का सुमेरु कहा गया है । परन्तु, इस ग्रन्थ के अन्तर्गत तुलसी के सम्बन्ध में केवल एक छप्पय मिलता है, जो इस प्रकार है:- त्रता काव्य निबन्ध करी सत कोटि रमायन । इक अच्छर उच्चरे ब्रह्म हत्यादि परायन ।। अब भक्तन सुखदेन बहुरि लीला विस्तारी । राम चरन रस मत्त रहत अहनिसि व्रतधारी । ससार अपार के पार को सुगम रीति नौका लयो । कलि कुटिल जीव निस्तार हित बालमीकि तुलसी भयो । इसी प्रकार 'भविष्य पुराण' में भी उल्लेख है। ना दास के छप्पय में गोस्वामीजी के महत्व का वर्णन है। उनकी अटूट राम-भक्ति और बाल्मीकि के अवतार होने का कथन है, पर उनके जीवन-चरित्र के सम्बद्ध में कोई उल्लेख नहीं । प्रियादास के भक्तमाल की टीका सं० १६६६ में लिखी गयी थी। इसमें गोस्वामी जी के अलौकिक कृत्यों का ११ छन्दों में वर्णन है। इसमें तुलसी के द्वारा किये गये चमत्कारों के संकेत हैं, जैसे वाटिका में हनुमर्शन, ब्रह्महत्या- निवारण, दिल्लीपति बादशाह जहाँगीर से संघर्ष आदि । ये तत्कालीन किंव दन्तियों का रूप स्पष्ट करते हैं। यह टीका जनश्रुति का लिखित रूप है, पर यह जनश्रुति बहुत पुरानी होने से तुलसीदास के माहात्म्य को स्पष्ट करती है। एफ एस० ग्राउज़ ने अपने रामचरित मानस के अंग्रजी अनुवाद की भूमिका में इसके तथा वेणीमाधवदास के गोसाई चरित के आधार पर तुलसीदास की जीवनी दी है। अलौकिक कृत्यों का ही विवरण होने से हम इसे ऐतिहासिक महत्त्व नहीं प्रदान कर सकते ।
मृत्यु-तिथि मृत्यु का सं० १६८० तो सभी को मान्य है। परन्तु कुछ लोग, सावन शुक्ला सप्तमी निधन तिथि मानते हैं, जो भ्रमवश दूसरे दोहे के प्रसङ्ग से लगा लिया जाता है। काशी के जमींदार और गोसाई जी के मित्र टोडर के उत्तरा- धिकारी सावन कृष्ण ३ को निधन तिथि मानते हैं और इसी दिन सीधा आदि देते हैं। यही तिथि 'मूल गोसई चरित' के इस दोहे में प्रकट है:- संवत सोलह से असी, असी गंग के तीर । सावन स्यामा तीज सनि, तुलसी तजे शरीर । यह तिथि गणना से भी सही उतरती है । अतः सर्वमान्य है । यह है तुलसी के लौकिक जीवन का विवरण ।
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रविवार, 19 अक्टूबर 2025
TULSIDAS -- JIVNI AUR SAHITYA -EK MIMANSA
उनमें एच ० ए्च० विव्सन, गासों द तासी, एफ० एस» ग्राउस, शिवसिंह सेगर, ग्रिवर्सन, २० ग्रीब्स, इणिश्टयन प्रेससे प्रकाशित मानस की भूमिका दे लेखकगण, लाला सीताराम, इन्द्रदेबनारायण, शिवनन्दन सहाय, तुल्सीग्रग्थावली' तृतीय भागके सम्पादकगण, रामकिशोर झुकछ, रामदास गाट, इ्वाम सुन्दर दास और
पीताम्बरदत्त बड़ध्वाल, सोरों जिला एटाके गोविन्दबब्लम भद् शास्त्री, गारीशंकर द्विवेदी, रामनरेंश निषानी, रामदत्त भारद्वाज, भद्रदत्त द्ा्मा, दीनदयाल भुन तथा माताप्रसाद गुप्त प्रभति सज्जनो के नाम झग्लेसयनीय
विब्सनने अपने 'एस्क्रेच आब् दी रेलिजस सेक्ट्सू आब हिल्दृूज' नाभक निबन्धम हुरूसीका जीवन-चरित दिया है। गारसों द तासीने सन् १८३६ ई० में प्रथम बार प्रकाशित अपने महत्वप्ृर्ण इतिहास “इस्त्वार दल लितरे तोर इन्दुईं ए इन्दुस्तानी में भोस्वामीजीकी जीवनी-विषयक कुछ बात लिखी है ओर ग्राउस साहवने इस विषयमे जो संकेत किया ६ वह उनके रामावणके अंग्रेजी अनुबाद गमाबन | तुलसीदास नामक अन्यकी ममिकामें है। इन तीनोंके दारा गोस्वाभीजीका जो जीवन-बृत्त अंकित किया गया है उसमें परस्पर कोई अन्दर नहीं दिखाई पड़ता । कोरी जनश्रुतिके आधारपर विव्सनग याबाजीकी जाति, जन्मभूमि, काशीमे कार्य-क्षेत्र, गुरु-परग्परा, देहाबलान आदिका जो कुछ उल्टेख किया था उसीयों तासी और ग्राउसने किश्वित् फेर-फारके साथ अहण किया है। हाँ, झाउसनें 'भक्तमाल के प्रसिद्ध छप्पय 'कलिकुटिल जीव निस्तार हित' * 'तुल्सी भयी । को विशेष महत्व दिया है |
ग्रियर्सन साइबने जी कुछ लिखा है वह सन् १८८६ ३० में प्रकाशित उनके “मार्ड्न वार्नाक्युलर लिशआपर आव हिन्दस्तान में है | इसके अनन्तर उन्होंने सन् १८९३ इ० की “इण्डियन ऐण्टीक्वेरी'में अपने नोंग्स आन तुल्मीदास'के तीसरे खण्डमें जीवन-इत्तसे सम्बद्ध कथानकों ओर जनशभ्रुतियोंका संग्रह उपस्थित किया | सन् १८६८ ईं० में डेट आवब कम्पोजीशन आव ठुलसीदासस् कवित्त रामायन के दसरे नोटमें तुल्सीकी मृत्यु प्लेगसे हुई, यह निर्णय किया | ग्रियर्सनने जो विचार किया है वह अवश्य ही बहुत-कुछ युक्त एवं गम्भीर है। इन्होंने जन-श्रुतियों को छान-बीनकर ग्रहण किया है । इसका परिणाम बह हुआ कि इनके परवर्ती आलोचकॉमेंसे अधिकांशने इन्हींकी खोजोंसे छाम उठाया है |
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सम् १८९९ इईं० की “नागरी प्रचारिणी पत्रिका मे प्रकाशित श्रीब्जका एक छोथ लेख '“गुसाई तुलसीदासका जीवन चरित' यद्यपि जीवनीविधयक कोई नवीन बात नहीं वताता, पर अपनी सुन्दर शेलीके कारण मोहक है | ग्रीव्जने अंग्रेजीमें हिन्दी-साहित्यका जो इतिहास लिखा है उसमें भी अत्यन्त संक्षेप, किन्तु बढ़े ही आकर्षक ढंगसे तुल्सीके जीवन-बृत्तकी चर्चा की है
ग्रीव्जके पश्चात् सन् १९०२ ई० में “इण्डियन प्रेस से प्रकाशित मानस'की भूमिकामें वर्णित जीवनचित विशेषतः ग्रियर्सनके अनुसन्धानोंपर अवलरूम्बित है ।
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कारपेण्टर साहबने गोस्वामीजीके धारमिक मत दी भियोल्जी आवब तुलसीदास मे विचार किया है। इस ग्रन्थका प्रकाशन सन् १९१८ ६० में हुआ | इसमें छेखकने मानस के आध्यात्मिक स्थर्तन को छोॉटकर कवि सिद्धांतांका निप्कर्प निकालना चाहा है। प्रस्तकर्म सबसे अधिक खट्कनेवाली बात यह हे कि लेखकके दृष्टिकोणपर ईसाई “'मिशनरी'का चश्मा चढ़ा है । दसरे यदि तुल्सीदासकी 'थिवोलॉजी' लिखर्नी थी तो उनके सभी ग्न्थोंका आधार लेना चाहिये था, न कि केबछ 'मानस' के कुछ स्थलोंका । आलोचकर्त तट्स्थ इष्टिकोणका अमाब भी खटकता है। फिर भी एक विदेशीका प्रयास होनेक्े नाते गनन््ध स्तुत्य ही है
रविवार, 12 अक्टूबर 2025
गोस्वामी तुलसीदास
हिन्दी-साहित्य का भक्ति-युग अनेक प्रकार की भारतीय एवं अ्रभारतीय विचा रधाराश्रों के संघर्ष का काल था। उस समय भारतीय दर्शन के अनेक सम्प्रदाय प्रचलित थे। उस समय की दार्शनिक विचार-धारा पर सर्वाधिक प्रभाव वेदान्त का था । वेदान्त के भ्रन्तर्गत बहुधा दाशंनिक दृष्टि से शद्धूर के अद्वेतवाद, रामानुज के विशिष्टाद्वेतवाद, निम्बार्क के द्वेताहेतवाद और वल्लभ के शुद्धाइतवाद का समावेश किया जाता है। वैष्णव आचार्यों ने शद्भूराचार्य के मायावाद के विरोध में मायापति सगुण भगवान् और उनकी स्वरसलीलाओं को प्रतिष्ठा दी। उक्त काल के धामिक क्षेत्र में वैष्णव, शव एवं शाक्त सम्प्रदायों का विशिष्ट स्थान था। इन सम्प्रदायों के अनेक मतावलम्धियों ने प्राचीन धर्म और दर्शन के बहुत से शास्त्रीय तत्त्वों की उपेक्षा की और अपनी नयी विचार-प्रणाली प्रचलित की । इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि विभिन्न धामिक सम्प्रदायों में परस्पर-विरोध की भावना बढ़ती गयी । सामाजिक जगत् में, अ्वर जातियों के लोग परंपरागत वर्णव्यवस्था की श्रेष्ठता पर आपत्ति प्रकट करने लगे थे। उनका वर्णवाद-विरोधी स्वर हिन्दी- साहित्य के निर्गुण-सन्तों की रचनाओ्रों में स्पष्टतया मुखरित हुआ्ना । श्रभारतीय इस्लाम और ईसाई धर्म-भावना के प्रहारों से बचने के लिए हिन्दू-समाज को रूढ़िवादिता एवं शास्त्रानुशासन में ही आत्मकल्याण तथा स्वधरममं-रक्षा का उपाय दिखाया पड़ा । महात्मा तुलसीदास के आविर्भाव के समय हिन्दी-साहित्य में चार भक्तिधाराएँ थीं। निर्गुणब्रह्मोपासक सन््तों ने श्रवतारवाद और ब्राह्मण-धर्म का विरोध करते हुए निर्गुणब्रह्मभक्ति का प्रचार किया । भारतीय तथा अ्भारतीय विचारधारा से प्रभावित सफियों ने प्रतीकों और प्रेमाख्यानों के द्वारा निराकार परमात्मा के प्रति जीवात्मा के प्रेम का निरूपण किया । क्ृष्णभक्त कवियों का ध्यान भगवान् कृष्ण की लीला- माधुरी पर केन्द्रित हुआ । रामभक्तिशाखा में मर्यादापुरुषोत्तम राम का लोकमजु लकारी रूप अड्धित किया गया। धर्म, दर्शन और भक्ति-आन्दोलन की इस भूमिका में गोस्वामी तुलसीदास ने पदापंण किया। उन्होंने अपने साहित्य में विभिन्त आस्तिक दर्शनों एवं धामिक सम्प्रदायों की मौलिक मान्यताश्रों का समन्वय करते हुए श्रुतिसम्मत रामभक्तिदर्शन की प्रतिष्ठा की ।
========================उपधिसापेक्ष अ्रध्ययन के क्षेत्र में देश और विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा डॉक्टरेट उपाधियों के लिए स्वीकृत लगभग बीस शोधप्रबंध ऐसे हैं जिनमें मुख्य या गौण रूप से तुलसीदास के दाशंनिक सिद्धांतों का अ्रध्ययन प्रस्तुत किया गया है। निम्तांकित शोधप्रबंधों का मुख्य प्रति- पाद्य तुलसी-दर्शन ही है--- १. दि थियॉलॉजी श्रॉफ़ तुलसीदास---डा० जें० एन० कारपेन्टर, (डी० डी०) २. तुलसी-दर्शंन---डा० बलदेव प्रसाद मिश्र, (डी० लिठ० ) ३. दि फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ तुलसीदास---डा ० रामदत्त भारद्वाज, (पी-एच० डी० ) ४. तुलसीदास : जीवनी और विचारधारा--डा ० राजाराम रस्तोगी, (पी-एच० डी०) तुलसी-साहित्य के विद्वान् भाष्यकारों, आलोचकों एवं अनुसंधाताश्रों ने उनकी दाशेनिक मान्यताओं को यधामति और यथाशक्ति समकने-समभाने का स्तृत्य प्रयास किया है। लेखक उन सब का कृतज्ञ है। उनके गवेषणात्मक अध्ययन का अध्ययन कर लेने पर यह अपेक्षित प्रतीत हुआ कि तुलसी-दर्शन के अनुशीलन को और भी आगे बढ़ाया जाए-->उनकी दार्शनिकता का निरूपण करके उनके दाशंनिक आधार को स्पष्ट किया जाए; उनकी समस्त कृतियों का मंथन करके दाशंनिक विचारों का शास्त्रीय दुष्टि से सुक्ष्मतर वर्गीक रण, विवेचन और विश्लेषण किया जाए ; उनके साहित्य में बहुधा उल्लिखित काल-कर्म-स्वभाव-गुण एवं सृष्टि, त्रिविधशरीर, पंचकोश, श्रंत:क रणचतुष्टय, धर्मदररन, भक्तिरस आदि अव्याख्यात अथवा अत्पव्याख्यात चिषयों का व्यवस्थित व्याख्यात किया जाए ;
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तुलसी-दशन के विशेषज्ञ विद्वान् डा० बलदेवप्रसाद मिश्र ने 'रामचरितमानस' के प्रथम चार सोपानों की पुष्पिकाओं * के ग्राधार पर वैराग्य के चार रूपों का विवेचन किया है। वेराग्य का पहला रूप है--तृष्णा के प्रति वेराग्य । इसको तुलसी ने 'विभल संतोष' कहा है। प्रवल तृष्णाएँ तीन हँ--भ्राहार, विहार और समाज-प्रियता अभ्रथवा कंचन (वित्तेषणा), कामिनी (पुत्रेषणा) और कीति (लोकषणा )। 'रामचरितमानस के प्रथम सोपान की कथा में तुलसी ने विश्वामित्र, अहल्या, तपोवन-वासियों, जनक, परशुराम, नागरिकों, दशरथ, सीता और राम की संतोषसिद्धि का उपस्थापन करके तृष्णा के प्रति वेराग्य की निदर्शना की है।* असंतोष जीव के संसार का कारण है, अ्रतएवं संतोष मुक्ति का साधन माना गया है |"
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रविवार, 11 अगस्त 2024
जन कवि तुलसीदास
हे हुलसी नंदन तुलसी
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साहुत बनामय खातिर जे कउल रहे हें। उइ तखरी मा गूलर का तउल रहे हें।। कान बहय लागी जो सुन ल्या हा फुर हेन जात बाले जातै का पउल र...
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बघेली दारू बन्द बिहार मा लागू कड़क अदेश। भर धांधर जो पिअय खै आबा मध्य प्रदेश। । आबा मध्य प्रदेश हियां ता खुली ही हउली। पानी कै ही ...