खुद्दारी में उम्र बिताई,
छाछ को कहते नहीं मलाई।
अंतर के उद्गार हमारे,
ठकुर सुहाती कभी न भाई।
दिन को रात नहीं कहते हम,
कैसे कहते पर्वत,,,राई।
आज नहीं तो कल गायेगी,
दुनिया हेमराज प्रभुताई।
लेकिन हम तो नहीं रहेंगे,
सुनने को मंगल मधुराई।
अस्तु,न रोको हंस हमें तुम,
कह लेने दो मन की भाई।
जब,जब बाँचा हंस आपको,
हमने पाई है कविताई।
धार मिले यूँ नित्य कलम को,
शुभ सनेह के साथ बधाई।
GURU JI RAMNARESH TIWARI
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें