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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

बेंचि रहा हो ऊन

 रोजी  कै अद्धत नहीं,  बेरोजगार  का हून। 

जस जाड़े कांपत कोउ, बेंचि  रहा हो ऊन।।   

हेमराज हंस 

रात सजी जग मग जागत है।
देस स्वस्तिक अस लागत है।।
दिया लेस के कहय अमाबस
हे ! रघुनंदन जू का स्वागत है।।
हेमराज हंस भेड़ा

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