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रविवार, 19 अक्टूबर 2025

TULSIDAS -- JIVNI AUR SAHITYA -EK MIMANSA

 जीवन-चरित-विचार--इस वर्गकी आलोचनाएँ लितगे प्रचुर परिमाणमे प्म्तृत हुई ३ उतनेई। अन्य किसी प्रकारकी नहीं | आधुनिक काल्‍लके जिन विद्वानोंने दस क्षेत्र किसी प्रकारदा प्रयास किया /.

उनमें एच ० ए्च० विव्सन, गासों द तासी, एफ० एस» ग्राउस, शिवसिंह सेगर, ग्रिवर्सन, २० ग्रीब्स, इणिश्टयन प्रेससे प्रकाशित मानस की भूमिका दे लेखकगण, लाला सीताराम, इन्द्रदेबनारायण, शिवनन्दन सहाय, तुल्सीग्रग्थावली' तृतीय भागके सम्पादकगण, रामकिशोर झुकछ, रामदास गाट, इ्वाम सुन्दर दास और

पीताम्बरदत्त बड़ध्वाल, सोरों जिला एटाके गोविन्दबब्लम भद् शास्त्री, गारीशंकर द्विवेदी, रामनरेंश निषानी, रामदत्त भारद्वाज, भद्रदत्त द्ा्मा, दीनदयाल भुन तथा माताप्रसाद गुप्त प्रभति सज्जनो के नाम झग्लेसयनीय 

विब्सनने अपने 'एस्क्रेच आब्‌ दी रेलिजस सेक्ट्सू आब हिल्दृूज' नाभक निबन्धम हुरूसीका जीवन-चरित दिया है। गारसों द तासीने सन्‌ १८३६ ई० में प्रथम बार प्रकाशित अपने महत्वप्ृर्ण इतिहास “इस्त्वार दल लितरे तोर इन्दुईं ए इन्दुस्तानी में भोस्वामीजीकी जीवनी-विषयक कुछ बात लिखी है ओर ग्राउस साहवने इस विषयमे जो संकेत किया ६ वह उनके रामावणके अंग्रेजी अनुबाद गमाबन | तुलसीदास नामक अन्यकी ममिकामें है। इन तीनोंके दारा गोस्वाभीजीका जो जीवन-बृत्त अंकित किया गया है उसमें परस्पर कोई अन्दर नहीं दिखाई पड़ता । कोरी जनश्रुतिके आधारपर विव्सनग याबाजीकी जाति, जन्मभूमि, काशीमे कार्य-क्षेत्र, गुरु-परग्परा, देहाबलान आदिका जो कुछ उल्टेख किया था उसीयों तासी और ग्राउसने किश्वित्‌ फेर-फारके साथ अहण किया है। हाँ, झाउसनें 'भक्तमाल के प्रसिद्ध छप्पय 'कलिकुटिल जीव निस्तार हित' * 'तुल्सी भयी । को विशेष महत्व दिया है |

ग्रियर्सन साइबने जी कुछ लिखा है वह सन्‌ १८८६ ३० में प्रकाशित उनके “मार्ड्न वार्नाक्युलर लिशआपर आव हिन्दस्तान में है | इसके अनन्तर उन्होंने सन्‌ १८९३ इ० की “इण्डियन ऐण्टीक्वेरी'में अपने नोंग्स आन तुल्मीदास'के तीसरे खण्डमें जीवन-इत्तसे सम्बद्ध कथानकों ओर जनशभ्रुतियोंका संग्रह उपस्थित किया | सन्‌ १८६८ ईं० में डेट आवब कम्पोजीशन आव ठुलसीदासस्‌ कवित्त रामायन के दसरे नोटमें तुल्सीकी मृत्यु प्लेगसे हुई, यह निर्णय किया | ग्रियर्सनने जो विचार किया है वह अवश्य ही बहुत-कुछ युक्त एवं गम्भीर है। इन्होंने जन-श्रुतियों को छान-बीनकर ग्रहण किया है । इसका परिणाम बह हुआ कि इनके परवर्ती आलोचकॉमेंसे अधिकांशने इन्हींकी खोजोंसे छाम उठाया है |

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सम्‌ १८९९ इईं० की “नागरी प्रचारिणी पत्रिका मे प्रकाशित श्रीब्जका एक छोथ लेख '“गुसाई तुलसीदासका जीवन चरित' यद्यपि जीवनीविधयक कोई नवीन बात नहीं वताता, पर अपनी सुन्दर शेलीके कारण मोहक है | ग्रीव्जने अंग्रेजीमें हिन्दी-साहित्यका जो इतिहास लिखा है उसमें भी अत्यन्त संक्षेप, किन्तु बढ़े ही आकर्षक ढंगसे तुल्सीके जीवन-बृत्तकी चर्चा की है

ग्रीव्जके पश्चात्‌ सन्‌ १९०२ ई० में “इण्डियन प्रेस से प्रकाशित मानस'की भूमिकामें वर्णित जीवनचित विशेषतः ग्रियर्सनके अनुसन्धानोंपर अवलरूम्बित है ।

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कारपेण्टर साहबने गोस्वामीजीके धारमिक मत दी भियोल्जी आवब तुलसीदास मे विचार किया है। इस ग्रन्थका प्रकाशन सन्‌ १९१८ ६० में हुआ | इसमें छेखकने मानस के आध्यात्मिक स्थर्तन को छोॉटकर कवि सिद्धांतांका निप्कर्प निकालना चाहा है। प्रस्तकर्म सबसे अधिक खट्कनेवाली बात यह हे कि लेखकके दृष्टिकोणपर ईसाई “'मिशनरी'का चश्मा चढ़ा है । दसरे यदि तुल्सीदासकी 'थिवोलॉजी' लिखर्नी थी तो उनके सभी ग्न्थोंका आधार लेना चाहिये था, न कि केबछ 'मानस' के कुछ स्थलोंका । आलोचकर्त तट्स्थ इष्टिकोणका अमाब भी खटकता है। फिर भी एक विदेशीका प्रयास होनेक्े नाते गनन्‍्ध स्तुत्य ही है



शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

HEMRAJ KE PRATI

खुद्दारी में उम्र बिताई,
छाछ को कहते नहीं मलाई।
अंतर के उद्गार हमारे,
ठकुर सुहाती कभी न भाई।
दिन को रात नहीं कहते हम,
कैसे कहते पर्वत,,,राई।
आज नहीं तो कल गायेगी,
दुनिया हेमराज प्रभुताई।
लेकिन हम तो नहीं रहेंगे,
सुनने को मंगल मधुराई।
अस्तु,न रोको हंस हमें तुम,
कह लेने दो मन की भाई।
जब,जब बाँचा हंस आपको,
हमने पाई है कविताई।
धार मिले यूँ नित्य कलम को,
शुभ सनेह के साथ बधाई। 
GURU JI RAMNARESH TIWARI

रविवार, 12 अक्टूबर 2025

गोस्वामी तुलसीदास

 हिन्दी-साहित्य का भक्ति-युग अनेक प्रकार की भारतीय एवं अ्रभारतीय विचा रधाराश्रों के संघर्ष का काल था। उस समय भारतीय दर्शन के अनेक सम्प्रदाय प्रचलित थे। उस समय की दार्शनिक विचार-धारा पर सर्वाधिक प्रभाव वेदान्त का था । वेदान्त के भ्रन्तर्गत बहुधा दाशंनिक दृष्टि से शद्धूर के अद्वेतवाद, रामानुज के विशिष्टाद्वेतवाद, निम्बार्क के द्वेताहेतवाद और वल्लभ के शुद्धाइतवाद का समावेश किया जाता है। वैष्णव आचार्यों ने शद्भूराचार्य के मायावाद के विरोध में मायापति सगुण भगवान्‌ और उनकी स्वरसलीलाओं को प्रतिष्ठा दी। उक्त काल के धामिक क्षेत्र में वैष्णव, शव एवं शाक्‍त सम्प्रदायों का विशिष्ट स्थान था। इन सम्प्रदायों के अनेक मतावलम्धियों ने प्राचीन धर्म और दर्शन के बहुत से शास्त्रीय तत्त्वों की उपेक्षा की और अपनी नयी विचार-प्रणाली प्रचलित की । इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि विभिन्‍न धामिक सम्प्रदायों में परस्पर-विरोध की भावना बढ़ती गयी । सामाजिक जगत्‌ में, अ्वर जातियों के लोग परंपरागत वर्णव्यवस्था की श्रेष्ठता पर आपत्ति प्रकट करने लगे थे। उनका वर्णवाद-विरोधी स्वर हिन्दी- साहित्य के निर्गुण-सन्तों की रचनाओ्रों में स्पष्टतया मुखरित हुआ्ना । श्रभारतीय इस्लाम और ईसाई धर्म-भावना के प्रहारों से बचने के लिए हिन्दू-समाज को रूढ़िवादिता एवं शास्त्रानुशासन में ही आत्मकल्याण तथा स्वधरममं-रक्षा का उपाय दिखाया पड़ा । महात्मा तुलसीदास के आविर्भाव के समय हिन्दी-साहित्य में चार भक्तिधाराएँ थीं। निर्गुणब्रह्मोपासक सन्‍्तों ने श्रवतारवाद और ब्राह्मण-धर्म का विरोध करते हुए निर्गुणब्रह्मभक्ति का प्रचार किया । भारतीय तथा अ्भारतीय विचारधारा से प्रभावित सफियों ने प्रतीकों और प्रेमाख्यानों के द्वारा निराकार परमात्मा के प्रति जीवात्मा के प्रेम का निरूपण किया । क्ृष्णभक्त कवियों का ध्यान भगवान्‌ कृष्ण की लीला- माधुरी पर केन्द्रित हुआ । रामभक्तिशाखा में मर्यादापुरुषोत्तम राम का लोकमजु लकारी रूप अड्धित किया गया। धर्म, दर्शन और भक्ति-आन्दोलन की इस भूमिका में गोस्वामी तुलसीदास ने पदापंण किया। उन्होंने अपने साहित्य में विभिन्‍त आस्तिक दर्शनों एवं धामिक सम्प्रदायों की मौलिक मान्यताश्रों का समन्वय करते हुए श्रुतिसम्मत रामभक्तिदर्शन की प्रतिष्ठा की ।


========================उपधिसापेक्ष अ्रध्ययन के क्षेत्र में देश और विदेश के विभिन्‍न विश्वविद्यालयों द्वारा डॉक्टरेट उपाधियों के लिए स्वीकृत लगभग बीस शोधप्रबंध ऐसे हैं जिनमें मुख्य या गौण रूप से तुलसीदास के दाशंनिक सिद्धांतों का अ्रध्ययन प्रस्तुत किया गया है। निम्तांकित शोधप्रबंधों का मुख्य प्रति- पाद्य तुलसी-दर्शन ही है--- १. दि थियॉलॉजी श्रॉफ़ तुलसीदास---डा० जें० एन० कारपेन्टर, (डी० डी०) २. तुलसी-दर्शंन---डा० बलदेव प्रसाद मिश्र, (डी० लिठ० ) ३. दि फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ तुलसीदास---डा ० रामदत्त भारद्वाज, (पी-एच० डी० ) ४. तुलसीदास : जीवनी और विचारधारा--डा ० राजाराम रस्तोगी, (पी-एच० डी०) तुलसी-साहित्य के विद्वान्‌ भाष्यकारों, आलोचकों एवं अनुसंधाताश्रों ने उनकी दाशेनिक मान्यताओं को यधामति और यथाशक्ति समकने-समभाने का स्तृत्य प्रयास किया है। लेखक उन सब का कृतज्ञ है। उनके गवेषणात्मक अध्ययन का अध्ययन कर लेने पर यह अपेक्षित प्रतीत हुआ कि तुलसी-दर्शन के अनुशीलन को और भी आगे बढ़ाया जाए-->उनकी दार्शनिकता का निरूपण करके उनके दाशंनिक आधार को स्पष्ट किया जाए; उनकी समस्त कृतियों का मंथन करके दाशंनिक विचारों का शास्त्रीय दुष्टि से सुक्ष्मतर वर्गीक रण, विवेचन और विश्लेषण किया जाए ; उनके साहित्य में बहुधा उल्लिखित काल-कर्म-स्वभाव-गुण एवं सृष्टि, त्रिविधशरीर, पंचकोश, श्रंत:क रणचतुष्टय, धर्मदररन, भक्तिरस आदि अव्याख्यात अथवा अत्पव्याख्यात चिषयों का व्यवस्थित व्याख्यात किया जाए ;

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 तुलसी-दशन के विशेषज्ञ विद्वान्‌ डा० बलदेवप्रसाद मिश्र ने 'रामचरितमानस' के प्रथम चार सोपानों की पुष्पिकाओं * के ग्राधार पर वैराग्य के चार रूपों का विवेचन किया है। वेराग्य का पहला रूप है--तृष्णा के प्रति वेराग्य । इसको तुलसी ने 'विभल संतोष' कहा है। प्रवल तृष्णाएँ तीन हँ--भ्राहार, विहार और समाज-प्रियता अभ्रथवा कंचन (वित्तेषणा), कामिनी (पुत्रेषणा) और कीति (लोकषणा )। 'रामचरितमानस के प्रथम सोपान की कथा में तुलसी ने विश्वामित्र, अहल्या, तपोवन-वासियों, जनक, परशुराम, नागरिकों, दशरथ, सीता और राम की संतोषसिद्धि का उपस्थापन करके तृष्णा के प्रति वेराग्य की निदर्शना की है।* असंतोष जीव के संसार का कारण है, अ्रतएवं संतोष मुक्ति का साधन माना गया है |" 

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शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

हे सारद माई करउँ चेरउरी

हे  सारद माई  करउँ चेरउरी। 
तोही चढ़ाइहौ नरिअर रेउरी।

नहीं जानव मैं छन्द ब्याकरन ।
कबि अस  मोरे नहीं आचरन।  ।
अइगुन करत बीत मोरी अउरी। 

हमूं का आसिरबाद दे  मइय्या। 
बुद्धि बिबेक से लाद दे मइय्या।। 
हे हँसबाहिनी ग्यान कै  गउरी । 

सब काही तैं   दिहे बुद्धि बर।  
मोर  तोरे  चरनन  मा  है  घर। । 
तउअव  मोर मती ही बउरी। 

कर दे ग्यान अच्छर कै बरखा। 
धोबर जाय  पाखण्ड औ  इरखा।।  
हंस के  हिदय  बना ले चउरी। 
हेमराज हंस 

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

बेंचि रहा हो ऊन

 रोजी  कै अद्धत नहीं,  बेरोजगार  का हून। 

जस जाड़े कांपत कोउ, बेंचि  रहा हो ऊन।।   

हेमराज हंस 

रात सजी जग मग जागत है।
देस स्वस्तिक अस लागत है।।
दिया लेस के कहय अमाबस
हे ! रघुनंदन जू का स्वागत है।।
हेमराज हंस भेड़ा

सरहा निकरा भेला द्याखा

या बिकास का रेला द्याखा।  
धँसा सड़क मां  ठेला द्याखा।।  
चालीस केर बेसाहन नरियर 
सरहा निकरा भेला द्याखा। ।   

सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

रविवार, 30 मार्च 2025

शनिवार, 11 जनवरी 2025

शनिवार, 14 दिसंबर 2024

दूगुन आमदानी का प्रमान आबा है।

दूगुन आमदानी का प्रमान आबा है। करजा मा लदा किसान आबा है।। उनखे खातिर है मूड़े के पीरा अस इनखे निता सीधा पिसान आबा है। ।।