हिन्दी-साहित्य का भक्ति-युग अनेक प्रकार की भारतीय एवं अ्रभारतीय विचा रधाराश्रों के संघर्ष का काल था। उस समय भारतीय दर्शन के अनेक सम्प्रदाय प्रचलित थे। उस समय की दार्शनिक विचार-धारा पर सर्वाधिक प्रभाव वेदान्त का था । वेदान्त के भ्रन्तर्गत बहुधा दाशंनिक दृष्टि से शद्धूर के अद्वेतवाद, रामानुज के विशिष्टाद्वेतवाद, निम्बार्क के द्वेताहेतवाद और वल्लभ के शुद्धाइतवाद का समावेश किया जाता है। वैष्णव आचार्यों ने शद्भूराचार्य के मायावाद के विरोध में मायापति सगुण भगवान् और उनकी स्वरसलीलाओं को प्रतिष्ठा दी। उक्त काल के धामिक क्षेत्र में वैष्णव, शव एवं शाक्त सम्प्रदायों का विशिष्ट स्थान था। इन सम्प्रदायों के अनेक मतावलम्धियों ने प्राचीन धर्म और दर्शन के बहुत से शास्त्रीय तत्त्वों की उपेक्षा की और अपनी नयी विचार-प्रणाली प्रचलित की । इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि विभिन्न धामिक सम्प्रदायों में परस्पर-विरोध की भावना बढ़ती गयी । सामाजिक जगत् में, अ्वर जातियों के लोग परंपरागत वर्णव्यवस्था की श्रेष्ठता पर आपत्ति प्रकट करने लगे थे। उनका वर्णवाद-विरोधी स्वर हिन्दी- साहित्य के निर्गुण-सन्तों की रचनाओ्रों में स्पष्टतया मुखरित हुआ्ना । श्रभारतीय इस्लाम और ईसाई धर्म-भावना के प्रहारों से बचने के लिए हिन्दू-समाज को रूढ़िवादिता एवं शास्त्रानुशासन में ही आत्मकल्याण तथा स्वधरममं-रक्षा का उपाय दिखाया पड़ा । महात्मा तुलसीदास के आविर्भाव के समय हिन्दी-साहित्य में चार भक्तिधाराएँ थीं। निर्गुणब्रह्मोपासक सन््तों ने श्रवतारवाद और ब्राह्मण-धर्म का विरोध करते हुए निर्गुणब्रह्मभक्ति का प्रचार किया । भारतीय तथा अ्भारतीय विचारधारा से प्रभावित सफियों ने प्रतीकों और प्रेमाख्यानों के द्वारा निराकार परमात्मा के प्रति जीवात्मा के प्रेम का निरूपण किया । क्ृष्णभक्त कवियों का ध्यान भगवान् कृष्ण की लीला- माधुरी पर केन्द्रित हुआ । रामभक्तिशाखा में मर्यादापुरुषोत्तम राम का लोकमजु लकारी रूप अड्धित किया गया। धर्म, दर्शन और भक्ति-आन्दोलन की इस भूमिका में गोस्वामी तुलसीदास ने पदापंण किया। उन्होंने अपने साहित्य में विभिन्त आस्तिक दर्शनों एवं धामिक सम्प्रदायों की मौलिक मान्यताश्रों का समन्वय करते हुए श्रुतिसम्मत रामभक्तिदर्शन की प्रतिष्ठा की ।
========================उपधिसापेक्ष अ्रध्ययन के क्षेत्र में देश और विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा डॉक्टरेट उपाधियों के लिए स्वीकृत लगभग बीस शोधप्रबंध ऐसे हैं जिनमें मुख्य या गौण रूप से तुलसीदास के दाशंनिक सिद्धांतों का अ्रध्ययन प्रस्तुत किया गया है। निम्तांकित शोधप्रबंधों का मुख्य प्रति- पाद्य तुलसी-दर्शन ही है--- १. दि थियॉलॉजी श्रॉफ़ तुलसीदास---डा० जें० एन० कारपेन्टर, (डी० डी०) २. तुलसी-दर्शंन---डा० बलदेव प्रसाद मिश्र, (डी० लिठ० ) ३. दि फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ तुलसीदास---डा ० रामदत्त भारद्वाज, (पी-एच० डी० ) ४. तुलसीदास : जीवनी और विचारधारा--डा ० राजाराम रस्तोगी, (पी-एच० डी०) तुलसी-साहित्य के विद्वान् भाष्यकारों, आलोचकों एवं अनुसंधाताश्रों ने उनकी दाशेनिक मान्यताओं को यधामति और यथाशक्ति समकने-समभाने का स्तृत्य प्रयास किया है। लेखक उन सब का कृतज्ञ है। उनके गवेषणात्मक अध्ययन का अध्ययन कर लेने पर यह अपेक्षित प्रतीत हुआ कि तुलसी-दर्शन के अनुशीलन को और भी आगे बढ़ाया जाए-->उनकी दार्शनिकता का निरूपण करके उनके दाशंनिक आधार को स्पष्ट किया जाए; उनकी समस्त कृतियों का मंथन करके दाशंनिक विचारों का शास्त्रीय दुष्टि से सुक्ष्मतर वर्गीक रण, विवेचन और विश्लेषण किया जाए ; उनके साहित्य में बहुधा उल्लिखित काल-कर्म-स्वभाव-गुण एवं सृष्टि, त्रिविधशरीर, पंचकोश, श्रंत:क रणचतुष्टय, धर्मदररन, भक्तिरस आदि अव्याख्यात अथवा अत्पव्याख्यात चिषयों का व्यवस्थित व्याख्यात किया जाए ;
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तुलसी-दशन के विशेषज्ञ विद्वान् डा० बलदेवप्रसाद मिश्र ने 'रामचरितमानस' के प्रथम चार सोपानों की पुष्पिकाओं * के ग्राधार पर वैराग्य के चार रूपों का विवेचन किया है। वेराग्य का पहला रूप है--तृष्णा के प्रति वेराग्य । इसको तुलसी ने 'विभल संतोष' कहा है। प्रवल तृष्णाएँ तीन हँ--भ्राहार, विहार और समाज-प्रियता अभ्रथवा कंचन (वित्तेषणा), कामिनी (पुत्रेषणा) और कीति (लोकषणा )। 'रामचरितमानस के प्रथम सोपान की कथा में तुलसी ने विश्वामित्र, अहल्या, तपोवन-वासियों, जनक, परशुराम, नागरिकों, दशरथ, सीता और राम की संतोषसिद्धि का उपस्थापन करके तृष्णा के प्रति वेराग्य की निदर्शना की है।* असंतोष जीव के संसार का कारण है, अ्रतएवं संतोष मुक्ति का साधन माना गया है |"
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