हमरे नुकसान केर डाँड़ बांकी है।
दुस्ट औ कृतघ्न कै दुइ फांड़ बांकी है।।
जोकर उपाय कइ सब हीच चुके हैं
फलाने कहि रहें हें की भाँड़ बांकी है। ।
हमरे नुकसान केर डाँड़ बांकी है।
जे गरीब तक से लिहिन, अपने पुरबी घूंस।
देशभक्ति के सभा मा, ओखर जबर जलूस।।गीतांश ---
सुध कीन्हिस कोउ आई हिचकी।
अपना ता सेंतय का बिचकी।।
बीत रहीं अगहन की रातैं।
कुकर करै अदहन की बातैं।।
सुन सुन के बिदुराथी डेचकी।
सुध कीन्हिस कोउ आई हिचकी।।
रहि - रहि के सुहराथै तरबा।
मुंदरी से बोलियाथै फ्यरबा।।
औ आपन अंगुरी चूमै सिसकी।
सुध कीन्हिस केउ आई हिचकी।।
श्री सूर्यमणि शुक्ल
काल्ह कउआ बताबत रहा सुआ से।