श्री सूर्यमणि शुक्ल
अपने इस बोली बानी जिसे पहले ,रेवा ,यानी नर्मदा के उद्गम के आस पास विकसित होने के कारण ,रिमही, कहा जाता था और बाद में बघेली कहा गया उस में तमाम कवियों का परिचय और उनकी कविताओ को प्रस्तुत करते मुझे लगभग दो माह होने को है। आज 50 वे कवि और उनकी कविता दे रहा हूं।
तमाम कवियों की कविताओ में आये मुहाबरे ,अलग अलग क्षेत्रो के कहन में आये आंशिक बदलाव आदि का भी मुझे खुद इससे ब्यापक अनुभव हुआ है ।
क्यों कि मैने प्रायः हर कवि की कविता को कई कई बार पढ़ कर खुद टाइप की है। अब मेरा यह स्तम्भ लगभग 5 दिन बाद पूरा हो जाय गा । क्यों कि कविताओ का स्रोत छीजता जा रहा है।
आज मैं जिस जेष्ठ कवि से आप की भेट करा रहा हूं वे श्री सूर्यमणि शुक्ल है। शिक्षक पद से सेवा निबृत्त श्री शुक्ल का जन्म रीवा जिले के नईगढ़ी तहसील के बेलबा गाव में हुआ था।
उनकी दोतीन पुस्तके प्रकाशाधीन है जिनमे एक बघेली काब्य संकलन ,,चाई माई,, भी है। श्री शुक्ल के सवैया छन्द बड़े ही सरस् है। आइये आप को भी उनकी मधुरता का रसास्वादन कराते है।उनके यह छन्द किसान, सरपंच , बिटिया एवम सुंदरता आदि शीर्षक से है।
राग नही कुछु साग नही,
घिउ दूध नही बस काम के बेला,
साझि सकार न जानि परै,
बस जनि रहे जस जुझ्झ बघेला।।
घाम म चाभ सिझी सगली,
लसियांन हि पूर गुड़े कस भेला।
हाइ किसान नधी पहटी ,
के तरी ढकिले जइसे कातिक ढेला।।
बॉदर हाथ परी तरवारि ,
उतारि के मूड दरे धइ देइही।
जे कल पे दरिया न मिली,
उ फूलउरी मिले उरझेट के खइही।।
घाम म बैठ बगार रहे ,
कुरसी म धसे अउघइनि जइही।
फाइलि के मूडसउरेंन मा,
उलटाइ के सील म औठ लगइही।।
बिटिया त बनी घर के लक्षमी,
परिवार क पाल उ बंस बढ़ाई।
घर कै सगली घोसियारी करी,
भिनसारे से जागी सबै क जगाई।।
अपने जिउ का न मरै कबहू ,
लड़िका मनसेरू क देत खबाई।
जेकरे घर मा बिटिया न रही,
गुड़ पानी दुआरे त केउ न पाई।।
राहि रहै कउनो निकही ,
बिन रेगी गये नहि सुन्दरि लागे।
रूप कै राशि हवै दुलही,
पति साथ बिना मरजाद के लागे।।
गाँव घरे केर सुख्ख इहै,
महिमान के आये कुढ़ी खुब लागे,
सील सकोच बिना उपकार,
बडो मनई खूब छोटि क लागे।।
पदम् श्री बाबूलाल दाहिया जी की फेसबुक वाल से साभार