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गुरुवार, 12 दिसंबर 2024

लिहे किसनमा ठाढ़ है

 लिहे किसनमा ठाढ़ है, खेते कै फ़रियाद।

बिजली घाई गोल ही, मोरे बीज कै खाद।।
हेमराज हंस

संत सताबत देख के

 संत सताबत देख के,लगी हिदय मा ठेस।

केतू नामक हराम है, जालिम बांग्ला देस।।
हेमराज हंस

हमरे नुकसान केर डाँड़ बांकी है।

 हमरे नुकसान केर डाँड़ बांकी है।

दुस्ट औ कृतघ्न कै दुइ फांड़ बांकी है।।
जोकर उपाय कइ सब हीच चुके हैं
फलाने कहि रहें हें की भाँड़ बांकी है। ।

जेखर उपरउझा लिहिस

 जेखर उपरउझा लिहिस, जूझा भारत देस।

वहय सनातन का बना, सबसे बड़ा कलेस।।
हेमराज हंस

जे गरीब तक से लिहिन

 जे गरीब तक से लिहिन, अपने पुरबी घूंस।

देशभक्ति के सभा मा, ओखर जबर जलूस।।
हेमराज हंस

सुध कीन्हिस कोउ आई हिचकी।

 गीतांश --- 

सुध कीन्हिस कोउ आई हिचकी। 

अपना  ता  सेंतय  का बिचकी।।


बीत   रहीं  अगहन  की रातैं। 

कुकर  करै  अदहन की बातैं।।

सुन सुन के बिदुराथी  डेचकी। 

सुध कीन्हिस कोउ आई हिचकी।।


रहि - रहि  के सुहराथै तरबा।

मुंदरी से  बोलियाथै  फ्यरबा।।

औ आपन  अंगुरी चूमै  सिसकी। 

सुध कीन्हिस केउ आई हिचकी।।  

सोमवार, 2 दिसंबर 2024

काल्ह कउआ बताबत रहा सुआ से

काल्ह   कउआ    बताबत    रहा    सुआ से। 
ओही मोतिआ बिन्द होइगा जग्ग के धुंआ से।।

जयन्त  भले   बड़े   बाप  केर   बेटबा  आय   
ओहू  कै  आँख  फुटि गै  कुदृष्टि  खुआ  से।। 
 
उनखे मन मा  ही खराबी की तन ख़राब है 
खजुरी  उच रही  ही मखमल के रुआ से ।। 

सिंघासन के पेरुआ सब दिन भयभीत रहे  हें 
कबौं सामना नहीं किहिन खुल के गेरुआ से।।

कहि द्या खबीस से कि वा उछिन्न ना करय 
हंस  कै  रण  चण्डी  टोर देयी  नेरुआ से  ।।
हेमराज हंस - भेदा मैहर  

गुरुवार, 21 नवंबर 2024

मंगलवार, 19 नवंबर 2024

हमी रूप से का मतलब,

 हमी  रूप  से का  मतलब, हम ता आंखर मा रीझे हन। 
बानी के मंत्र लिखे कागद, हम मस मा खूब पसीझे हन।।
तुम प्रेम पिआसी पिंगला ता , हम उदासीन भरथरी हयन 
तुम्ही  शुभ  होय  तुम्हार  प्रेम, हम ता आंसू मा भींजे हन।। 
हेमराज हंस 

श्री सूर्यमणि शुक्ल

  श्री सूर्यमणि शुक्ल

अपने इस बोली बानी जिसे पहले ,रेवा ,यानी नर्मदा के उद्गम के आस पास विकसित होने के कारण ,रिमही, कहा जाता था और बाद में बघेली कहा गया उस में तमाम कवियों का परिचय और उनकी कविताओ को प्रस्तुत करते मुझे लगभग दो माह होने को है। आज 50 वे कवि और उनकी कविता दे रहा हूं।
तमाम कवियों की कविताओ में आये मुहाबरे ,अलग अलग क्षेत्रो के कहन में आये आंशिक बदलाव आदि का भी मुझे खुद इससे ब्यापक अनुभव हुआ है ।
क्यों कि मैने प्रायः हर कवि की कविता को कई कई बार पढ़ कर खुद टाइप की है। अब मेरा यह स्तम्भ लगभग 5 दिन बाद पूरा हो जाय गा । क्यों कि कविताओ का स्रोत छीजता जा रहा है।
आज मैं जिस जेष्ठ कवि से आप की भेट करा रहा हूं वे श्री सूर्यमणि शुक्ल है। शिक्षक पद से सेवा निबृत्त श्री शुक्ल का जन्म रीवा जिले के नईगढ़ी तहसील के बेलबा गाव में हुआ था।
उनकी दोतीन पुस्तके प्रकाशाधीन है जिनमे एक बघेली काब्य संकलन ,,चाई माई,, भी है। श्री शुक्ल के सवैया छन्द बड़े ही सरस् है। आइये आप को भी उनकी मधुरता का रसास्वादन कराते है।उनके यह छन्द किसान, सरपंच , बिटिया एवम सुंदरता आदि शीर्षक से है।
किसान
राग नही कुछु साग नही,
घिउ दूध नही बस काम के बेला,
साझि सकार न जानि परै,
बस जनि रहे जस जुझ्झ बघेला।।
घाम म चाभ सिझी सगली,
लसियांन हि पूर गुड़े कस भेला।
हाइ किसान नधी पहटी ,
के तरी ढकिले जइसे कातिक ढेला।।
सरपंच
बॉदर हाथ परी तरवारि ,
उतारि के मूड दरे धइ देइही।
जे कल पे दरिया न मिली,
उ फूलउरी मिले उरझेट के खइही।।
घाम म बैठ बगार रहे ,
कुरसी म धसे अउघइनि जइही।
फाइलि के मूडसउरेंन मा,
उलटाइ के सील म औठ लगइही।।
बिटिया
बिटिया त बनी घर के लक्षमी,
परिवार क पाल उ बंस बढ़ाई।
घर कै सगली घोसियारी करी,
भिनसारे से जागी सबै क जगाई।।
अपने जिउ का न मरै कबहू ,
लड़िका मनसेरू क देत खबाई।
जेकरे घर मा बिटिया न रही,
गुड़ पानी दुआरे त केउ न पाई।।
सुंदरता
राहि रहै कउनो निकही ,
बिन रेगी गये नहि सुन्दरि लागे।
रूप कै राशि हवै दुलही,
पति साथ बिना मरजाद के लागे।।
गाँव घरे केर सुख्ख इहै,
महिमान के आये कुढ़ी खुब लागे,
सील सकोच बिना उपकार,
बडो मनई खूब छोटि क लागे।।
पदम् श्री बाबूलाल दाहिया जी की फेसबुक वाल से साभार